दिल पे चलता ही नहीं अब कोई बस


दिल पे चलता ही नहीं अब कोई बस
आरज़ू होती नहीं है  टस  से  मस

दौर--हाज़िर का ये सरमाया है बस
खुदसरी, मतलब परस्ती और हवस

ये गुज़र जाता है ठोकर मार कर
कब किसी का वक़्त पर चलता है बस

आशियाँ की आंच पहुंची है यहाँ
तीलियाँ तपती हैं, जलता है क़फ़स

डूब  जाए  नाउम्मीदी  का  जहाँ
आज ऐ बारान--रहमत यूँ बरस

सूखता जाता है दिल का आबशार
ज़िन्दगी में अब कहाँ बाक़ी वो रस

मैं करूँ फ़रियाद? नामुमकिन, तो क्यूँ
"कोई खाए मेरी हालत पर तरस"

है यक़ीं ख़ुद पर तो फिर "मुमताज़" जी
क्यूँ भला दिल में है इतना पेश--पस

dil pe chalta hi nahiN ab koi bas
aarzoo hoti nahiN hai tas se mas

daur e haazir ka ye sarmaaya hai bas
khudsari, matlab parasti aur hawas

ye guzar jaata hai thokar maar kar
kab kisi ka waqt par chalta hai bas

aashiyaaN ki aanch pahonchi hai yahaN
teeliyaaN tapti haiN, jalta hai qafas

doob jaae naaummeedi ka jahan
aaj ae baaraan e rahmat yuN baras

sookhta jaata hai dil ka aabshaar
zindagi meN ab kahaN baaqi wo ras

maiN karuN fariyaad? naamumkin, to kyuN
"koi khaae meri haalat par taras"


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