फिर जाग उठा जूनून, फिर अरमाँ मचल गए


फिर  जाग  उठा  जूनून, फिर  अरमाँ  मचल  गए
हम  फिर  सफ़र  के  शौक़  में  घर  से  निकल  गए

मुस्तक़बिलों1  के  ख़्वाब  में  हम  महव2  थे  अभी
और  ज़िन्दगी  के  हाथ  से  लम्हे  फिसल  गए

आसाँ  कहाँ  था  क़ैद    तअल्लुक़   से  छूटना
वो  मुस्करा  दिया,  कि  इरादे  बहल  गए

शायद  बिखर  ही  जाती  मेरी  ज़ात  जा    जा3
अच्छा  हुआ  के  वक़्त  से  पहले  संभल  गए

सूरज  से  जंग  करने  की  नादानी  की  ही  क्यूँ
अब  क्या  उड़े  जूनून,  कि  जब  पर  ही  जल  गए

खोटे  खरे  कि  बाक़ी  रही  है  कहाँ  तमीज़
अब  तो  यहाँ  फ़रेब  के  सिक्के  भी  चल  गए

तशकील4  दे  के  ख़्वाब  को  हर  बार  तोडना
ये  पैंतरे  नसीब  के  हम  को  तो  खल  गए

छूने  चले  थे  हम,  कि   हुआ  ख़्वाब  वो  तमाम
"मुट्ठी  में      पाए  कि  जुगनू  फिसल  गए"

"मुमताज़" हम  को  जिन  कि  इबादत  पे  नाज़  था
बस  इक  ज़रा  सी  आंच  से  वो  बुत  पिघल  गए
1- भविष्य, 2- गुम, 3- जगह जगह पर, 4- रूप

phir jaag utha junoon, phir armaaN machal gae
ham phir safar ke shauq meN ghar se nikal gae

mustaqbiloN ke khwaab men ham mehv the abhi
aur zindagi ke haath se lamhe phisal gae

aasaaN kahaN tha qaid e taalluq se chhootna
wo muskra diya, ke iraade bahl gae

shaayad bikhar hi jaati meri zaat ja ba ja
achha hua ke waqt se pahle sambhal gae

sooraj se jang karne ki naadani ki hi kyuN
ab kya ude junoon, ke jab par hi jal gae

khote khare ki baaqi rahi hai kahaN tameez
ab to yahaN fareb ke sikke bhi chal gae

tashkeel de ke khwaab ko har baar todna
ye paintre naseeb ke ham ko to khal gae

chhune chale the ham, ke hua khwaab wo tamaam
"mutthi meN aa na paae ke jugnoo phisal gae"

"mumtaz" ham ko jin ki ibaadat pe naaz tha
bas ik zara si aanch se wo but pighal gae

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