ये राहतों में पिघलती सी बेकली क्यूँ है


ये राहतों में पिघलती सी बेकली क्यूँ है
अजीब फाँस सी दिल में चुभी हुई क्यूँ है

न मुनहसिर है अमल पर, न हौसलों की बिसात
यहाँ नसीब की मोहताज हर ख़ुशी क्यूँ है

ज़रा सी धूप भी लग जाए तो ये जल जाए
ये शोहरतों का जहाँ इतना काग़ज़ी क्यूँ है

ये क़ुर्बतों में अजब फ़ासला सा कैसा है
बसा है रूह में, फिर भी वो अजनबी क्यूँ है

जो मुझ को सुननी थी, लेकिन कही नहीं तुम ने
बिछड़ते वक़्त भी वो बात फिर कही क्यूँ है

हर एक सिम्त खिज़ाओं का सर्द मौसम है
ये दिल की शाख़ तमन्ना से फिर लदी क्यूँ है

मचलती ख़ुशियाँ हैं, हर सिम्त राहतें हैं तो फिर
तेरी निगाह में "मुमताज़" ये नमी क्यूँ है

ye raahtoN meN pighalti si bekali kyuN hai
ajeeb phaans si dil meN chubhi hui kyun hai

na munhasir hai amal par, na hauslon ki bisaat
yahaN naseeb ki mohtaaj har khushi kyuN hai

zara si dhoop bhi lag jaae to ye jal jaae
ye shohratoN ka jahaN itna kaaghzi kyuN hai

ye qurbatoN men ajab faasla sa kaisa hai
basaa hai rooh meN, phir bhi wo ajnabee kyun hai

jo mujh ko sunni thi, lekin kahi nahiN tum ne
bichhadte waqt bhi wo baat phir kahi kyuN hai

har ek simt khizaaoN ka sard mausam hai
ye dil ki shaakh tamanna se phir ladi kyuN hai

machalti khushiyaaN haiN, har simt raahteN haiN to phir
teri nigaah meN "Mumtaz" ye nami kyuN hai

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