नज़्म - उम्मीद (امید)




मैं तेरी मुंतज़िर ताउम्र जानाँ रह भी सकती हूँ
हर इक रंज-ओ-अलम हर इक मुसीबत सह भी सकती हूँ
है इसमें ज़िंदगी, मुझको ये मरना भी गवारा है
तुम्हारी इक नज़र जानाँ मेरे दिल का सहारा है
میں تیری منتظر تاعمر جاناں رہ بھی سکتی ہوں
ہر اک رنج و الم ہر اک مصیبت سہ بھی سکتی ہوں
ہے اس میں زندگی، مجھ کو یہ مرنا بھی گوارہ ہے
تمھاری اک نظر جاناں مرے دل کا سہارا ہے

रिहा हो कर तुम्हारी क़ैद से आख़िर कहाँ जाऊँ
तुम्हारा साथ हो तो आस्माँ धरती पे ले आऊँ
तसव्वर की ज़मीं का गोशा गोशा तुमने घेरा है
तुम्हारे रास्ते की ख़ाक में मेरा बसेरा है
رہا ہو کر تمھاری قید سے آخر کہاں جاؤں
تمہارا سااتھ ہو تو آسماں دھرتی پہ لے آؤں
تصور کی زمیں کا گوشہ گوشہ تم نے گھیرا ہے
تمہارے راستے کی خاک میں میرا بسیرا ہے

बुझाऊँ जितना आतिश इश्क़ की उतना भड़कती है
तुम्हारी जुस्तजू में ज़िंदगी जानाँ धड़कती है
मेरी राहों में ताहद्द-ए-नज़र उल्फ़त ही उल्फ़त है
बताऊँ क्या, तुम्हारे हिज्र में भी कितनी लज़्ज़त है
ज़ुबाँ से रेशमी यादों के क़तरे चाट लेती हूँ
ये घड़ियाँ हिज्र की उम्मीद से मैं काट लेती हूँ
بجھاؤں جتنا آتش عشق کی اتنا بھڑکتی ہے
تمہاری جستجو میں زندگی جاناں دھڑکتی ہے
مری راہوں میں تاحدِ نظر الفت ہی الفت ہے
بتاؤں کیا، تمہارے ہجر میں بھی کتنی لذت ہے
زباں سے ریشمی یادوں کے قطرے چاٹ لیتی ہوں
یہ گھڑیاں ہجر کی امید سے میں کاٹ لیتی ہوں

मगर उम्मीद की लड़ियों के मोती बिखरे जाते हैं
ज़हन में गूँजते ख़दशात मुझको आज़माते हैं
मुक़द्दर से ये दिल इस मर्तबा जो जंग हारा है
तमन्ना रेज़ा रेज़ा है, मोहब्बत पारा पारा है
مگر امید کی لڑیوں کے موتی بکھرے جاتے ہیں
ذہن میں گونجتے خدشات مجھ کو آزماتے ہیں
مقدر سے یہ دل اس مرتبہ جو جنگ ہارا ہے
تمنا ریزہ ریزہ ہے، محبت پارہ پارہ ہے

मगर फिर सोचती हूँ, मात इन हालात की होगी
कोई तो सुबह भी आख़िर अँधेरी रात की होगी
कभी कोई किरण सूरज का भी पैग़ाम लाएगी
तजल्ली भी कोई तारीकियों में जगमगाएगी
مگر پھر سوچتی ہوں، مات ان حالات کی ہوگی
کوئ تو صبح بھی آخر اندھیری رات کی ہوگی
کبھی کوئ کرن سورج کا بھی پیغام لائیگی
تجلی بھی کبھی تاریکیوں میں جگمگائیگی

कभी तो ज़ुलमतों की रात से राहत तुलू होगी
उफ़क़ से बदनसीबी के अभी क़िस्मत तुलू होगी
کبھی تو ظلمتوں کی رات سے راحت طلوع ہوگی
افق سے بدنصیبی کے ابھی قسمت طلوع ہوگی

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