नात - करम करम या शाहे मदीना (2004 में रेकॉर्ड हुई )

रंज-ओ-अलम से चूर है सीना
मुश्किल है अब मेरा जीना
करम करम या शाह-ए-मदीना

है सर पे बलाओं का साया जीने से दिल है घबराया
वो दर्द का आलम है आक़ा जीने से भी दिल उकताया
तारीकी ही तारीकी हर सू, आती नहीं कोई राह नज़र  
फ़रियाद ये ले कर आए हैं सरकार तुम्हारी चौखट पर
अब तुम न सुनोगे तो आक़ा फिर कौन सुनेगा हाल-ए-अलम
तुम से ही सवाल है रहमत का या रहमत-ए-आलम कर दो करम
अब बहर-ए-ख़ुदा ग़म दूर करो
बस रौशन कर दो मेरा सीना
करम करम या शाह-ए-मदीना

आसार-ए-क़यामत है हर सू है आपकी उम्मत ख़तरे में
है कुफ़्र की गहरी तारीकी छाई हुई ज़र्रे ज़र्रे में
उस ओर बसफ़ है सारा जहाँ इस ओर मदद को कोई नहीं
अल्लाह भी शायद रूठा है, हामी नहीं, पैरो कोई नहीं
अब तुम ही कोई इमदाद करो हो तुम ही तो हादी उम्मत के
सरकार न ऐसे मुँह फेरो, हो आप समंदर रहमत के
अब तुम ही सिपहसालार बनो
और आज मिटा दो ज़ुल्म का क़ीना
करम करम या शाह-ए-मदीना

फिर एक दफ़आ तकबीर का नारा सारे जहाँ में गूंज उठे
फिर एक दफ़आ तौहीद का कलमा कौन-ओ-मकाँ में गूँज उठे
फिर पहला ज़माना आ जाए तारीख़ वो ख़ुद को दोहराए
फिर ग़ाज़ी-ओ-शुहदा पैदा हों और फ़त्ह-ए-जहाँ फिर हो जाए
बू बक्र-ओ-ग़नी, हमज़ा-ओ-उमर, हस्नैन-ओ-अली फिर पैदा हो
अल्लाह हमारा हामी हो अल्लाह के हम सब शैदा हों
फिर जाम-ए-अक़ीदत कर दो अता
फिर छलका दो वहदत की मीना

करम करम या शाह-ए-मदीना 

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