ग़ज़ल - ऐसा जमूद रूह पे तारी हुआ कि बस


ऐसा जमूद रूह पे तारी हुआ कि बस
कुछ यूँ चली बहार में ठंडी हवा, कि बस
AISA JAMOOD ROOH PE TAARI HUA KE BAS
KUCHH YUN CHALI BAHAAR MEN THANDI HAWA KE BAS

घबरा के इब्तेदा ही में क्यूँ कर दिया कि बस
कुछ और भी सुनोगे मेरा माजरा कि बस
GHABRA KE IBTEDA HI MEN KYUN KEH DIYA KE BAS
"KUCHH AUR BHI SUNOGE MERA MAAJRA KE BAS"

हम तो किसी सितम का गिला भी न कर सके
कुछ इस तरह से उसने कहा मुद्दुआ कि बस
HAM TO KISI SITAM KA GILA BHI NA KAR SAKE
KUCHH IS TARAH SE US NE KAHA MUDDA'AA KE BAS

जश्न-ए-क़ज़ा-ए-मेहर-ए-मुनव्वर था शाम को
ऐसी चमक रही थी उरूसी क़बा कि बस
JASHN E QAZAA E MEHR E MUNAWWAR THA SHAM KO
AISI CHAMK RAHI THI UROOSI QABAA KE BAS

मजबूरियों का कोह-ए-गराँ तोड़ते हुए
ऐसे हुए शिकस्ता मेरे दस्त-ओ-पा, कि बस
MAJBOORIYON KA KOH E GARAA.N TODTE HUE
AISE HUE SHIKASTA MERE DAST O PAA KE BAS

गिर कर बलन्दियों से ज़मीं पर बिखर गए
टूटा ख़ुमार-ए-ज़ात तो ऐसा लगा कि बस
GIR KAR BALANDIYON SE ZAMEE.N PAR BIKHAR GAEY
TOOTA KHUMAAR E ZAAT TO AISA LAGA KE BAS

उस की इनायतें भी अज़ाबों से कम न थीं
वो इंतेहा ख़ुलूस की, कहना पड़ा कि बस
US KI INAAYATEN BHI AZAABON SE KAM NA THIN
WO INTEHAA KHULOOS KI KEHNA PADA KE BAS

ऐसे तड़प के टूटा अना का ग़ुरूर भी
दिल में वो दर्द अबके तो कुछ यूँ उठा, कि बस
AISE TADAP KE TOOTA ANAA KA GHUROOR BHI
DIL MEN WO DARD AB KE TO KUCHH YUN UTHA KE BAS

रंगीनी-ए-फ़रेब-ए-मोहब्बत न पूछिए
लब ने कहा कि शुक्रिया, दिल ने कहा कि बस
RANGEENI E FAREB E MOHABBAT NA POOCHHIYE
LAB NE KAHA KE SHUKRIYA DIL NE KAHA KE BAS

इक सिलसिला सराब का और तश्नाकाम हम
मुमताज़ वो हयात के कर्ब-ए-बला कि बस
IK SILSILA SARAAB KA AUR TASHNAKAAM HAM
'MUMTAZ' WO HAYAAT KE KARB O BALAA KE BAS
जमूद जम जाना,  तारी हुआ छा गया, जश्न-ए-क़ज़ा-ए-मेहर-ए-मुनव्वर चमकीले सूरज की मौत का जश्न, उरूसी क़बा लाल कुर्ता, कोह-ए-गराँ भारी पर्वत, शिकस्ता थके हुए, दस्त-ओ-पा हाथ और पाँव, तश्नाकाम प्यासा

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