ग़ज़ल - सनम ये बंदगी ने आज कैसे कैसे ढाले हैं

सनम ये बंदगी ने आज कैसे कैसे ढाले हैं
दिलों के काबा-ओ-दैर-ओ-कलीसा तोड़ डाले हैं  
SANAM YE BANDGI NE AAJ KAISE KAISE DHAALE HAI.N
DILO.N KE KAABA O DAIR O KALEESA TOD DAALE HAI.N

हमारी रेज़ा रेज़ा रूह के जलते सहीफ़े के
हर इक बाब-ए-तमन्ना के सभी औराक़ काले हैं
HAMAARI REZA REZA ROOH KE JALTE SAHEEFE KE 
HAR IK BAAB E TAMANNA KE SABHI AURAAQ KAALE HAI.N

हटा लो मेरी आँखों से मसर्रत के सभी मंज़र
अभी बीनाई ज़ख़्मी है, अभी आँखों में छाले हैं
HATA LO MERI AANKHO.N SE MASARRAT KE SABHI MANZAR
ABHI BEENAAI ZAKHMI HAI ABHI AANKHON ME.N CHHALE HAI.N

न जाने किस ख़ुशी की आरज़ू में आज तक हमने
हर इक वीराना छाना है, सभी सेहरा खंगाले हैं
NA JAANE KIS KHUSHI KI AARZOO ME.N AAJ TAK HAM NE
HAR IK VEERANA CHHANA HAI, SABHI SEHRA KHANGAALE HAI.N

बिखर जाए ये शीराज़ा तो हम को भी सुकूँ आए
न जाने कब से रेज़ा रेज़ा हस्ती का संभाले हैं
BIKHAR JAAE YE SHEERAZA TO HAM KO BHI SUKOO.N AAEY
NA JAANE KAB SE REZA REZA HASTI KA SAMBHAALE HAI.N

रगों में भर गया है ज़हर तो आख़िर गिला क्यूँ हो
हमीं ने नाग अपनी आस्तीनों में तो पाले हैं
RAGO.N ME.N BHAR GAYA HAI ZEHR TO AAKHIR GILA KYU.N HO
HAMI.N NE NAAG APNI AASTEENO.N ME.N TO PAALE HAI.N

बलन्दी हो अगर परवाज़ में, पर नोच लेते हैं
यहाँ गुफ़्तार क़ैदी है यहाँ फ़िक्रों पे ताले हैं
BALANDI HO AGAR PARWAAZ ME.N, PAR NOCH LETE HAI.N
YAHA.N GUFTAAR QAIDI HAI, YAHA.N FIKRO.N PE TAALE HAI.N

कभी तो मुख़्तेसर होगी सियाही रात की आख़िर
पस-ए-तारीकी-ए-शब सुबह-ए-फ़र्दा के उजाले हैं
KABHI TO MUKHTASAR HOGI SIYAAHI RAAT KI AAKHIR
PAS E TAAREEKI E SHAB SUBH E FARDAA KE UJAALE HAI.N

है मुस्तक़बिल हमारा गामज़न फिर ग़ार की जानिब
हमारी सारी क़दरें अब तअस्सुब के हवाले हैं
HAI MUSTAQBIL HAMAARA GAAMZAN PHIR GHAAR KI JAANIB
HAMAARI SAARI QADRE.N AB TA'ASSUB KE HAWAALE HAI.N

कई ऐसे भी हैं बदबख़्त जिनके दिल के दामन में
फ़क़त आँसू ही आँसू हैं, फ़क़त नाले ही नाले हैं
KAI AISE BHI HAI.N BADBAKHT JIN KE DIL KE DAAMAN ME.N
FAQAT AANSOO HI AANSOO HAI.N, FAQAT NAALE HI NAALE HAI.N

इरादा है अगर मुमताज़ तो फिर देखना इक दिन
ज़मीं पर आस्माँ हम ही यक़ीनन लाने वाले हैं
IRAADA HAI AGAR 'MUMTAZ' TO PHIR DEKHNA IK DIN
ZAMEE.N PAR AASMAA.N HAM HI YAQEENAN LAANE WALE HAI.N


सनम मूर्ति, बंदगी पूजा, दैर मंदिर, कलीसा गिरिजा, रेज़ा रेज़ा टुकड़ा टुकड़ा, सहीफ़ा आसमानी किताब, बाब पाठ, औराक़ पन्ने, मसर्रत ख़ुशी, शीराज़ा किताब की सिलाई, रेज़ा रेज़ा कण कण, बीनाई देखने की क्षमता, परवाज़ उड़ान, गुफ़्तार बात चीत, मुख़्तेसर कम, पस-ए-तारीकी-ए-शब रात के अंधेरे के पीछे, सुबह-ए- फ़र्दा कल की सुबह, मुस्तक़बिल भविष्य, गामज़न चल रहा है, ग़ार गुफा, जानिब तरफ़, क़दरें संस्कार, तअस्सुब भेदभाव, बदबख़्त अभागे, फ़क़त सिर्फ़

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