ग़ज़ल - मुक़द्दर आज़माना चाहती हूँ

मुक़द्दर आज़माना चाहती हूँ
तुम्हें तुमसे चुराना चाहती हूँ
MUQADDAR AAZMAANA CHAAHTI HOON
TUMHEN TUM SE CHURAANA CHAAHTI HOON

ज़रा यादों मुझे तन्हा भी छोड़ो
मैं दो पल मुसकराना चाहती हूँ
ZARA YAADO MUJHE TANHA BHI CHHODO
MAIN DO PAL MUSKRAANA CHAAHTI HOON

ये गर्दिश ही निभा पाई न मुझ से
मैं इससे भी निभाना चाहती हूँ
YE GARDISH HI NIBHA PAAI NA MUJH SE
MAIN IS SE BHI NIBHAANA CHAAHTI HOON

ये दौलत ज़िन्दगी की रायगाँ है
इसे मैं अब लुटाना चाहती हूँ
YE DAULAT ZINDAGI KI RAAYGAA.N HAI
MAIN AB IS KO LUTAANA CHAAHTI HOON

तराशे जाती है क़िस्मत मुझे और
मैं वो पैकर पुराना चाहती हूँ
TARAASHE JAATI HAI QISMAT MUJHE AUR
MAIN WO PAIKAR PURAANA CHAAHTI HOON

बसा है काबा-ए-दिल में जो अब भी
वो बुत मैं अब गिराना चाहती हूँ
BASA HAI KAABA E DIL MEN JO AB BHI
WO BUT MAIN AB GIRAANA CHAAHTI HOON

ज़रा कुछ ख़्वाब तो तामीर कर लूँ
मैं इक बस्ती बसाना चाहती हूँ
ZARA KUCHH KHWAAB TO TAAMIR KAR LOON
MAIN IK BASTI BASAANA CHAAHTI HOON

घड़ी भर की भी राहत के लिए मैं
हर इक क़ीमत चुकाना चाहती हूँ
GHADI BHAR KI BHI RAAHAT KE LIYE MAIN
HAR IK QEEMAT CHUKAANA CHAAHTI HOON

हूँ वाक़िफ़ तो सभी चालों से लेकिन
मैं तुम से मात खाना चाहती हूँ
HOON WAAQIF TO SABHI CHAALON SE LEKIN
MAIN TUM SE MAAT KHAANA CHAAHTI HOON

मिटाती है मुझे क़िस्मत की रेखा
और इसको मैं मिटाना चाहती हूँ
MITAATI HAI MUJHE QISMAT KI REKHA
AUR IS KO MAIN MITAANA CHAAHTI HOON

जो बिखरी है अभी मुमताज़ हर सू
उसे महवर पे लाना चाहती हूँ
JO BIKHRI HAI ABHI 'MUMTAZ' HAR SOO
USE MAHWAR PE LAANA CHAAHTI HOON
रायगाँ बेकार, पैकर जिस्म, महवर धुरी

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