ग़ज़ल - बहारों के लहू से प्यास बुझती है ख़िज़ाओं की

हवस हर लम्हा बढ़ती जाती है हम ग़मफ़नाओं की
बहारों के लहू से प्यास बुझती है ख़िज़ाओं की
HAWAS HAR LAMHAA BADHTI JAATI HAI AB GHAM FANAAON KI
BAHAARON KE LAHOO SE PYAS BUJHTI HAI KHIZAAON KI

मेरी गुफ़्तार की क़ीमत चुकानी तो पड़ी मुझको
ख़मोशी भी तो तेरी मुस्तहक़ ठहरी सज़ाओं की
MERI GUFTAAR KI QEEMAT CHUKAANI TO PADI MUJH KO
KHAMOSHI BHI TO TERI MUSTAHAQ THEHRI SAZAAON KI

कोई आवाज़ अब कानों में दाख़िल ही नहीं होती
समाअत अब तलक तालिब है तेरी ही सदाओं की
KOI AAWAAZ AB KAANON MEN DAAKHIL HI NAHIN HOTI
SAMAA'AT AB TALAK TAALIB HAI TERI HI SADAAON KI

मुक़द्दर की ये तारीकी, सफ़र ये तेरी यादों का
चमक उठती हैं राहें रौशनी से ज़ख़्मी पाओं की
MUQADDAR KI YE TAARIKI SAFAR YE TERI YAADON KA
CHAMAK UTHTI HAIN RAAHEN ROSHNI SE ZAKHMEE PAAON KI

मरज़ ये लादवा है अब क़ज़ा के साथ जाएगा
मरीज़-ए-ज़िन्दगी को अब ज़रूरत है दुआओं की
MARAZ YE LAADAVAA TO AB QAZA KE SAATH JAAEGA
MAREEZ E ZINDGI KO AB ZAROORAT HAI DUAAON KI

मैं हूँ मायूस राहों से तो राहें सर ब सजदा हैं
कि मंज़िल चूमती है धूल बढ़ कर मेरे पाओं की
MAIN HUN MAAYUS RAAHON SE TO RAAHEN SAR BA SAJDA HAIN
KE MANZIL CHOOMTI HAI DHOOL BADH KE MERE PAAON KI

कड़कती धूप को हमने किया है सायबाँ अपना
किसे होगी ज़रूरत ऐ शजर अब तेरी छाओं की
KADAKTI DHOOP KO HAM NE KIYA HAI SAAYBAA.N APNA
KISE HOGI ZAROORAT AYE SHAJAR AB TERI CHHAAON KI

हमें मुमताज़ रास आ ही गई आख़िर ये महरूमी
नज़र अब हम उतारा करते हैं अपनी बलाओं की
HAMEN 'MUMTAZ' RAAS AA HI GAI AAKHIR YE MEHROOMI
NAZAR AB HAM UTAARA KARTE HAIN APNI BALAAON KI


ग़मफ़नाओं दुख में बर्बाद लोग, ख़िज़ाँ पतझड़, गुफ़्तार बोलना, मुस्तहक़ पात्र, समाअत सुनने की क्षमता, तालिब चाहने वाला, सदाओं आवाज़ों, तारीकी अँधेरा, लादवा जिसकी दावा न हो, क़ज़ा मौत, सर ब सजदा सजदे में झुका हुआ, शजर पेड़

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