ग़ज़ल - बेचैनी जब हद से बढ़ी हर ख़्वाब अधूरा तोड़ दिया

बेचैनी जब हद से बढ़ी हर ख़्वाब अधूरा तोड़ दिया
हर हसरत, हर रंज-ओ-अलम को मैं ने पीछे छोड़ दिया
BECHAINI JAB HAD SE BADHI HAR KHWAAB ADHOORA TOD DIYA
HAR HASRAT HAR RANJ O ALAM KO MAIN NE PEECHHE CHHOD DIYA

जोश-ए-जुनूँ जब रक़्स में आया हर दीवार गिरा डाली
हाइल थी जो राह में मुश्किल उस को बढ़ कर तोड़ दिया
JOSH E JUNOO.N JAB RAQS MEN AAYA HAR DEEWAR GIRA DAALI
HAAIL THI JO RAAH MEN MUSHKIL US KO BADH KAR TOD DIYA

जलती राह पे चलने से जब पावों ने इंकार किया
फिर मचली है, ज़िद ने मेरी फिर से छालों को फोड़ दिया
JALTI RAAH PE CHALNE SE JAB PAAON NE INKAAR KIYA
PHIR MACHLI HAI ZID NE MERI PHIR SE CHHAALON KO PHOD DIYA

नश्शा था पुरकैफ़ कि हमने क़तरा क़तरा पी डाला
बदज़न है अब ज़ीस्त कि हम ने हर इक दर्द निचोड़ दिया
NASSHA THA PURKAIF KE HAM NE QATRA QATRA PEE DAALA
BADZAN HAI AB ZEEST KE HAM NE HAR IK DARD NICHOD DIYA

जलते हुए सहरा के मंज़र आँखों में जब चुभने लगे
देखो तो हमने कैसे हर चाहत का रुख़ मोड़ दिया
JALTE HUE SEHRA KE MANZAR AANKHON MEN JAB CHUBHNE LAGE
DEKHO TO HAM NE KAISE HAR CHAAHAT KA RUKH MOD DIYA

टूटे फूटे बिखरे दिल का हर टुकड़ा बेक़ीमत था
फिर से समेटा है दिल को फिर किरची किरची जोड़ दिया
TOOTE PHOOTE BIKHRE DIL KA HAR TUKDA BEQEEMAT THA
PHIR SE SAMETA HAI DIL KO PHIR KIRACHI KIRACHI JOD DIYA

अंदेशा जब जब भी हुआ है हम को मात का बाज़ी में
मसलहतन भी अक्सर हम ने अपने दिल को तोड़ दिया
ANDESHA JAB JAB BHI HUA HAI HAM KO MAAT KA BAAZI MEN
MASLEHATAN BHI AKSAR HAM NE APNE DIL KO TOD DIYA

बोझ कहाँ तक ढोते हम अंजान सफ़र में अब इनका
झुँझला कर मुमताज़ हर इक ज़ख़्मी हसरत को छोड़ दिया
BOJH KAHAN TAK DHOTE HAM ANJAAN SAFAR MEN AB IN KA
JHUNJLA KAR 'MUMTAZ' HAR IK ZAKHMEE HASRAT KO CHHOD DIYA

रंज-ओ-अलम दुख दर्द, रक़्स नाच, हाइल रुकावट, पुरकैफ़ मज़ेदार, क़तरा क़तरा बूंद बूंद,

बदज़न नाराज़,

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