ग़ज़ल - इक निवाला न गया दहन में मेहनत के बग़ैर


इक निवाला न गया दहन में मेहनत के बग़ैर
कोई शय मिलती नहीं दहर में ज़हमत के बग़ैर  
IK NIWAALA NA GAYA DEHN MEN MEHNAT KE BAGHAIR
KOI SHAY MILTI NAHIN DEHR MEN ZEHMAT KE BAGHAIR

आज के दौर का इंसान हुआ है ताजिर
पूछता कोई नहीं फ़न को भी दौलत के बग़ैर
AAJ KE DAUR KA INSAAN HUA HAI TAAJIR
POOCHHTA KOI NAHIN FUN KO BHI DAULAT KE BAGHAIR

अब न इख़लास, न इख़लाक़, मोहब्बत है गुनाह
अब तो एहबाब भी मिलते नहीं हाजत के बग़ैर
AB NA IKHLAAS, NA IKHLAAQ, MOHABBAT HAI GUNAAH
AB TO EHBAAB BHI MILTE NAHIN HAAJAT KE BAGHAIR

हसरतें घुटती रहीं, ज़िन्दगी ख़ूँ रोती रही
क्या कहें कैसे जिये हम तेरी हसरत के बग़ैर
HASRATEN GHUT' TI RAHI.N ZINDAGI KHOO.N ROTI RAHI
KYA KAHEN KAISE JIYE HAM TERI CHAAHAT KE BAGHAIR

पूछ लें आप किसी से भी जो इस बस्ती में
एक भी सांस अगर लेता हो दहशत के बग़ैर
POOCHH LEN AAP KISI SE BHI JO IS BASTI MEN
EK BHI SAANS AGAR LETA HO DEHSHAT KE BAGHAIR

तुझ से हस्ती है मेरी ज़ीस्त का हासिल तू है
मैं कहाँ जाऊँ जहां में तेरी निस्बत के बग़ैर
TUJH SE HASTI HAI MERI, ZEEST KA HAASIL TU HAI
Main KAHAN JAAuN JAHAN MEN TERI NISBAT KE BAGHAIR

किस से महरूम तमन्नाओं का रोना रोएँ
ज़िन्दगी हम ने गुज़ारी है मोहब्बत के बग़ैर
KIS SE MEHROOM TAMANNAON KA RONA ROEN
ZINDAGI HAM NE GUZAARI HAI MOHABBAT KE BAGHAIR

टालती है हमें मुमताज़ न जाने कब से
आरज़ू है कि ग़नी कोई सख़ावत के बग़ैर
TAALTI HAI HAMEN 'MUMTAZ' NA JAANE KAB SE
AARZOO HAI KE GHANI KOI SAKHAAWAT KE BAGHAIR


निवाला कौर, दहन मुँह, शय चीज़, दहर दुनिया, ज़हमत तकलीफ़, ताजिर व्यापारी, फ़न कला, इख़लास - सच्ची मोहब्बत, इख़लाक़ मिलनसारी, एहबाब प्यारे लोग, हाजत ज़रूरत, ग़नी अमीर, सख़ावत दानवीरता 

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