ग़ज़ल - कब ज़मीं हामी है मेरी, कब फ़लक बरहम नहीं

कब ज़मीं हामी है मेरी, कब फ़लक बरहम नहीं
सामने हालात के मेरी जबीं भी ख़म नहीं
KAB ZAMEEN HAAMI HAI MERI KAB FALAK BARHAM NAHIN
SAAMNE HAALAAT KE MERI JABEE.N BHI KHAM NAHIN

जानलेवा हैं बहुत यादों की ये बेचैनियाँ
भूल जाने में भी लेकिन कुछ अज़ीयत कम नहीं
JAANLEWA HAIN BAHOT YAADON KI YE BECHAINIYAAN
BHOOL JAANE MEN BHI LEKIN KUCHH AZEEAT KAM NAHIN

लातअल्लुक़ हूँ मैं अपनी ज़िन्दगी से यूँ कि अब
ग़म नहीं तक़दीर का, एहसास का मातम नहीं
LAATA'ALLUQ HOON MAIN APNI ZINDAGI SE YUN KE AB
GHAM NAHIN TAQDEER KA EHSAAS KA MAATAM NAHIN

उड़ रही हैं धज्जियाँ नाकाम जज़्बों की मगर
तुम को भी परवा नहीं, हम को भी कोई ग़म नहीं
UD RAHI HAIN DHAJJIYAN NAAKAAM JAZBON KI MAGAR
TUM KO BHI PARWA NAHIN MUJH KO BHI KOI GHAM NAHIN

ले गया वो साथ सारी रौनक़ें, हर इक ख़ुशी
दे गया रंज-ओ-अलम, ये भी इनायत कम नहीं
LE GAYA WO SAATH SAARI RAUNAQEN HAR IK KHUSHI
DE GAYA RANJ O ALAM YE BHI INAAYAT KAM NAHIN

धूप की शिद्दत से चेहरा हर शजर का ज़र्द है
है ज़मीं मुर्दा, बहारों का हसीं मौसम नहीं
DHOOP KI SHIDDAT SE CHEHRA HAR SHAJAR KA ZARD HAI
HAI ZAMEE.N MURDA BAHARON KA HASEE.N MAUSAM NAHIN

तश्नगी ऐसी कि शबनम भी समंदर है मुझे
बेहिसी ऐसी कि दिल ख़ामोश, आँखें नम नहीं
TASHNAGI AISI KE SHABNAM BHI SAMANDAR HAI MUJHE
BEHISI AISI KE DIL KHAAMOSH AANKHEN NAM NAHIN

आरज़ू मुमताज़ मुझ से मुंह छुपाती है कि अब
मर चुकी हर तश्नगी अब प्यास का आलम नहीं
AARZOO 'MUMTAZ' MUJH SE MUNH CHHUPAATI HAI KE AB
MAR CHUKI HAR TASHNAGI AB PYAAS KA AALAM NAHIN


हामी समर्थक, फ़लक आसमान, बरहम नाराज़, जबीं माथा, ख़म झुका हुआ, अज़ीयत तकलीफ़, लातअल्लुक़ असंबंधित, रंज-ओ-अलम दुख और दर्द, शिद्दत तेज़ी, शजर पेड़, ज़र्द पीला, तश्नगी प्यास, बेहिसी भावना शून्यता, आरज़ू इच्छा 

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