ग़ज़ल - मुझ में क्या तेरे तसव्वर के सिवा रह जाएगा



मुझ में क्या तेरे तसव्वर के सिवा रह जाएगा
सर्द सा इक रंग फैला जा ब जा रह जाएगा
MUJH MEN KYA TERE TASAWWAR KE SIWA REH JAAEGA
SARD SA IK RANG PHAILA JAA BA JAA REH JAAEGA

कर तो लूँ तर्क-ए-मोहब्बत लेकिन उसके बाद भी
कुछ अधूरी ख़्वाहिशों का सिलसिला रह जाएगा
KAR TO LOON TARK E MOHABBAT LEKIN US KE BAAD BHI
KUCHH ADHOORI KHWAAHISHON KA SILSILA REH JAAEGA

कारवाँ तो खो ही जाएगा ग़ुबार-ए-राह में
दूर तक फैला हुआ इक रास्ता रह जाएगा
KAARWAAN TO KHO HI JAAEGA GHUBAAR E RAAH MEN
DOOR TAK PHAILA HUA IK RAASTA REH JAAEGA

टूट जाएंगी उम्मीदें, पस्त होंगे हौसले
एक तन्हा आदमी बेदस्त-ओ-पा रह जाएगा
TOOT JAAENGI UMMEEDEN PAST HONGE HAUSLE
EK TANHA AADMI BE DAST O PAA REH JAAEGA

मैं अगर अपनी ख़मोशी को अता कर दूँ ज़ुबाँ
हैरतों के दायरों में तू घिरा रह जाएगा
MAIN AGAR APNI KHAMOSHI KO ATAA KAR DOON ZUBAA.N
HAIRATON KE DAAIRON MEN TU GHIRA REH JAAEGA

रुत भी बदलेगी, बहारें आ भी जाएँगी मगर
इस ख़िज़ाँ का राज़ चेहरे पर लिखा रह जाएगा
RUT BHI BADLEGI BAHAAREN AA BHI JAAENGI MAGAR
IS KHIZAA.N KA RAAZ CHEHRE PE LIKHA REH JAAEGA

हाफ़िज़े से नक़्श यूँ ही मिटते जाएँगे अगर
दूर तक नज़रों में इक दश्त-ए-बला रह जाएगा
HAAFIZE SE NAQSH YUN HI MIT'TE JAAENGE AGAR
DOOR TAK NAZRON MEN IK DASHT E BALAA REH JAAEGA

अपना सब कुछ खो के पाया है तुझे मुमताज़ ने
खो गया तू भी तो मेरे पास क्या रह जाएगा
APNA SAB KUCHH KHO KE PAAYA HAI TUJHE 'MUMTAZ' NE
KHO GAYA TU BHI AGAR TO AUR KYA REH JAAEGA


तसव्वर - कल्पना, जा ब जा जगह जगह, तर्क-ए-मोहब्बत मोहब्बत का त्याग, बेदस्त-ओ-पा बिना हाथ पाँव के, ख़िज़ाँ पतझड़, हाफ़िज़ा याददाश्त, दश्त-ए-बला मुसीबत का जंगल 

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