नज़्म - आख़िरी लम्हा

वो बेताब लम्हे, वो बेख़्वाब रातें
वो बेख़ौफ़ जुरअत, वो बेबाक ख़्वाहिश
लगा दी है तुम ने मेरे दिल में जानाँ
ये कैसी अजब मीठी मीठी सी आतिश
WO BETAAB LAMHE WO BEKHWAAB RAATEN
WO BEKHAUF JUR'AT WO BEBAAK KHWAAHISH
LAGA DI HAI TUM NE MERE DIL MEN JAANAN
YE KAISI AJAB MEETHI MEETHI SI AATISH

धनक रंग ख़्वाबों के मसरूर जाले
ये साँसों की ख़ुशबू, नज़र के उजाले
ये उल्फ़त की ज़ंजीर, बाहों के घेरे
ये महकी हुई रौशनी के अंधेरे
DHANAK RANG KHWAABON KE MASROOR JAALE
YE SAASON KI KHUSHBOO NAZAR KE UJAALE
YE ULFAT KI ZANJEER BAAHON KE GHERE
YE MEHKI HUI RAUSHNI KE ANDHERE

गिरफ़्तार है ज़हन, तख़ईल क़ैदी
ये जज़्बात की शिद्दतों की सज़ा है
मगर दिल की हर आरज़ू कह रही है
कि इस क़ैद में कुछ अलग ही मज़ा है
GIRAFTAAR HAI ZEHN TAKHEEL QAIDI
YE JAZBAAT KI SHIDDATON KI SAZAA HAI
MAGAR DIL KI HAR AARZOO KEH RAHI HAI
KE IS QAID MEN KUCHH ALAG HI MAZAA HAI


धनक इन्द्र धनुष, मसरूर नशीला, तख़ईल कल्पना 

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