ग़ज़ल - है कर्ब माना बेकराँ, हयात बेक़रार है


है कर्ब माना बेकराँ, हयात बेक़रार है
इस एक बेक़रारी में क़रार ही क़रार है
HAI KARB MAANA BEKARAA.N HAYAT BEQARAAR HAI

IS EK BEQARAARI MEN QARAAR HI QARAAR HAI


इधर भी एक शोला सा दहक रहा है ज़ात में
उधर भी राख़ में अभी दबा वही शरार है
IDHAR BHI EK SHOLA SA DEHEK RAHA HAI ZAAT MEN

UDHAR BHI RAAKH MEN ABHI DABAA WAHI SHARAAR HAI


खिंचे खिंचे से वो भी हैं खिंचे खिंचे से हम भी हैं
ज़रा झुके न सर कहीं, अना का ये वक़ार है
KHINCHE KHINCHE SE WO BHI HAIN KHINCHE KHINCHE SE HAM BHI HAIN

ZARA JHUKE NA SAR KAHIN ANAA KA YE WAQAAR HAI


ये बेहिसी अजीब है, नशा बहुत शदीद है
अभी मेरे वजूद पे ख़ुमार का हिसार है
YE BEKHUDI AJEEB HAI NASHA BAHOT SHADEED HAI

ABHI MERE WAJOOD PE KHUMAAR KA HISAAR HAI


तक़ाज़ा वक़्त का ये है कि मस्लेहत से काम लें
बिखेर देगी ज़ात को दिलों में जो दरार है
TAQAAZA WAQT KA YE HAI KE MASLEHAT SE KAAM LEN

BIKHER DEGI ZAAT KO DILON MEN JO DARAAR HAI


ये इश्क़ आज ये कहाँ पे ले के हमको आ गया
यहाँ हर एक राह में ग़ुबार ही ग़ुबार है
YE ISHQ KIS JEGAH PE AAJ LE KE HAM KO AA GAYA

YAHAN HAR EK RAAH MEN GHUBAAR HI GHUBAAR HAI


छुपा हुआ हो जाने क्या सियाहियों में रात की
हमें भी नाज़ाँ फिक्र है, अदू भी होशियार है
CHHUPA HUA HO JAAANE KYA SIYAAHIYON MEN RAAT KI

HAMEN BHI 'NAZA.N' FIKR HAI ADOO BHI HOSHIYAAR HAI


कर्ब दर्द, बेकराँ अनंत, हयात ज़िन्दगी, शरार चिंगारी, अना अहं, वक़ार सम्मान, बेहिसी भावना शून्यता, शदीद तेज़, हिसार घेरा, मस्लेहत वक़्त के मुताबिक़ काम करना, अदू दुश्मन

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