ग़ज़ल - अगरचे राज़ ये उससे कभी कहा भी नहीं


अगरचे राज़ ये उससे कभी कहा भी नहीं
बिछड़ के उससे तो जीने का हौसला भी नहीं
 Agarche raaz ye us se kabhi kaha bhi nahin
bichhad ke us se to jeene ka hausla bhi nahin

हम अपने अपने वजूदों में फिर सिमट से गए
सुना भी उसने नहीं, मैं ने कुछ कहा भी नहीं
ham apne apne wajoodon men phir simat se gae
suna bhi us ne nahin main ne kuchh kaha bhi nahin

कोई जो रास्ता निकले तो मिट भी सकता है
न ख़त्म हो कभी, ऐसा तो फ़ासला भी नहीं
koi jo raasta nikle to mit bhi sakta hai
na khatm ho jo kabhi aisa faasla bhi nahin

हम अपनी अपनी अना के ग़ुबार में गुम थे
पुकारा हम ने नहीं, और वो रुका भी नहीं
ham apni apni anaa ke ghubaar men gum the
pukaara ham ne nahin aur wo ruka bhi nahin

न कोई ग़म, न उदासी, न बेहिसी, न उम्मीद
वो आरज़ू नहीं, यादों का सिलसिला भी नहीं
na koi gham na udaasi na behisi na ummeed
wo aarzoo nahin yaadon ka silsila bhi nahin

किया है तर्क उसे शान-ए-बेनियाज़ी के साथ
कोई उम्मीद नहीं, अब कोई गिला भी नहीं
kiya hai tark use shan e beniyaaz ke saath
koi ummeed nahin ab koi gilaa bhi nahin

बड़ी ख़मोशी से अबके तो बात ख़त्म हुई
हज़ार हैफ़ कि महशर कोई उठा भी नहीं
badi khamoshi se ab ke to baat khatm hui
hazaar haif ke mahshar koi utha bhi nahin

तपकता रहता है मुमताज़ दिल में रह रह कर
ये ज़ख़्म कारी है, इसकी कोई दवा भी नहीं
tapakta rehta hai 'MUMTAZ' dil men reh reh ke
ye zakhm kaari hai is ki koi dawaa bhi nahin


अना अहं, बेहिसी भावना शून्यता, तर्क त्याग, बेनियाज़ी बेपरवाही, गिला शिकायत, हैफ़ आश्चर्य, महशर प्रलय, तपकता टीसता, कारी कारगर

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