ग़ज़ल - जब निगाहों में कोई मंज़र पुराना आ गया

जब निगाहों में कोई मंज़र पुराना आ गया
याद हमको भूला बिसरा हर फ़साना आ गया
JAB NIGAAHON MEN KOI MANZAR PURAANA AA GAYA
YAAD HAM KO BHOOLA BISRA HAR FASAANA AA GAYA

अक़्ल दुनिया के चलन से आशना होने को थी
ज़ेहन में फिर वो ख़याल-ए-अहमक़ाना आ गया
AQL DUNIYA KE CHALAN SE AASHNA HONE KO THI
ZAHN MEN PHIR WO KHAYAAL-E-AHMAQAANA AA GAYA

बात थी मेहर-ओ-वफ़ा की और निशाने पर थे हम
हम को तोहमत से बचाने इक बहाना आ गया
BAAT THI MEHR-O-WAFAA KI AUR NISHANE PAR THE HAM
HAM KO TOHMAT SE BACHAANE IK BAHAANA AA GAYA

मुद्दतों सहरा नवर्दी से अभी लौटे थे हम
रास्ते में फिर तुम्हारा आस्ताना आ गया
MUDDATON SEHRAA NAWARDI SE ABHI LAUTE THE HAM
RAASTE MEN PHIR TUMHARA AASTAANA AA GAYA

बाहमी नाइत्तेफ़ाक़ी मिट ही जाती आख़िरश
दर्मियाँ अपने ये बेग़ैरत ज़माना आ गया
BAAHAMI NAAITTEFAAQI MIT HI JAATI AAKHIRASH
DARMIYAAN APNE YE BE GHAIRAT ZAMAANA AA GAYA

आज फिर परवाज़ की ताब-ओ-तवाँ जाती रही
भूक हावी है, ख़याल-ए-आब-ओ-दाना आ गया
AAJ PHIR PARWAAZ KI TAAB-O-TAWAAN JAATI RAHI
BHOOK HAAWI HAI KHAYAAL-E-AAB-O-DAANA AA GAYA

हम हों महवर पर, ये दुनिया चार सू गर्दिश करे
हम को भी "मुमताज़" फ़न ये आक़िलाना आ गया
HAM HON MAHWAR PAR YE DUNIYA CHAAR SOO GARDISH KARE
HAM KO BHI 'MUMTAZ' FAN YE AAQILAANA AA GAYA

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