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मसर्रतों की ज़मीं पर ये कैसी शबनम है

मसर्रतों की ज़मीं पर ये कैसी शबनम है ग़ुबार कैसा है सीने में , मुझ को क्या ग़म है क़दम क़दम प बिछे हैं हज़ारों ख़ार यहाँ अभी संभल के चलो , रौशनी ज़रा कम है ज़रा जो हँसने की कोशिश की , आँख भर आई शगुफ़्ता ख़ुशियों पे महरूमियों का मौसम है थकी थकी सी तमन्ना , उदास उदास उम्मीद बुझा बुझा सा कई दिन से दिल का आलम है जलन से तपने लगी है फ़िज़ा-ए-सहरा-ए-दिल हर एक साँस मेरी ज़िन्दगी का मातम है खिली खिली सी हँसी पर जमी जमी सी ख़लिश तरब के ज़ख़्म प ख़ुशफ़हमियों का मरहम है अभी है क़ैद में ख़ुशबू हैं रंग आवारा अभी बहार परेशाँ है , ज़ीस्त बरहम है नज़र में डूबती जाती हैं रौशनी की लवें यक़ीनन आज सितारों की आँख भी नम है चमन चमन प उदासी , शजर शजर ग़मगीं हर एक शाख़ प “ मुमताज़ ” ज़र्द परचम है     मसर्रतों-खुशियों , ख़ार-काँटे , शगुफ़्ता-खिली हुई , तरब-ख़ुशी , ज़ीस्त-जीवन , बरहम-नाराज़ , शजर-पेड़ , ज़र्द-पीला , परचम-झण्डा 

चंद हुसैनी अशआर

  सब्र-ए-हुसैनी की गर्मी ने फ़ख़्र-ए-यज़ीदी तोड़ दिया सर को झुका कर वक़्त ने वो तारीख़ का पन्ना मोड दिया रो रो कर देती है गवाही कर्बल की ग़म नाक ज़मीं देख के ये दिल सोज़ नज़ारा प्यास ने भी दम तोड़ दिया खेल कर जानों प ज़िंदा कर दिया इस्लाम को सुर्ख़ रू हैं अहल-ए-ईमाँ , रू सियह है हर यज़ीद इब्न-ए-असदुल्लाह से ले कर असग़र-ए-मासूम तक ख़ानदान-ए-हैदरी का बच्चा बच्चा है शहीद आ जाए हक़ पे बात तो जीना गुनाह है पैग़ाम मिट के दे गया कुनबा हुसैन का मलऊन दो जहाँ में ग़ुरूर-ए-यज़ीद है ज़िन्दा रहेगा आख़िरी सजदा हुसैन का उम्मत-ए-इस्लाम को कर दे अता अक़्ल-ए-सलीम तोड़ दे हर जोड़ अब इस आहनी ज़ंजीर का ऐ मेरे मालिक जो देना है हमारी क़ौम को दे जिगर ज़ैनब के जैसा , हौसला शब्बीर का तारीकी-ए-गुनाह में शम्म-ए-वफ़ा हुसैन जहल-ए-यज़ीदियत है कुजा और कुजा हुसैन पंजे क़ज़ा के जब बढ़े असग़र को छीनने अब्बास ने तड़प के पुकारा कि या हुसैन हसरत से देखते हैं कलेजे को थाम कर पैकाँ गुलू-ए-असग़र-ए-कमज़ोर का हुसैन नाना तड़प रहे हैं कि कौसर है मेरे हाथ और हाय रे ये प्यास का मारा मेरा हुसैन अल्लाह म

लग़्ज़िशों को शबाब देती हूँ

लग़्ज़िशों को शबाब देती हूँ फिर बहारों को ख़्वाब देती हूँ ख़ुद को यूँ भी अज़ाब देती हूँ आरज़ू का सराब देती हूँ सी के लब ख़ामुशी के धागों से हसरतों को अज़ाब देती हूँ जी रही हूँ बस एक लम्हे में इक सदी का हिसाब देती हूँ ज़ुल्म सह कर भी मुतमइन हूँ मैं ज़िन्दगी को जवाब देती हूँ वक़्त-ए-रफ़्ता के हाथ में अक्सर ज़िन्दगी की किताब देती हूँ बाल-ओ-पर की हर एक फड़कन को हौसला ? जी जनाब , देती हूँ हर इरादे की धार को फिर से आज “ मुमताज़ ” आब देती हूँ

माज़ी के निशाँ और हाल का ग़म जब एक ठिकाने मिलते हैं

माज़ी के निशाँ और हाल का ग़म जब एक ठिकाने मिलते हैं कुछ और चुभन बढ़ जाती है जब यार पुराने मिलते हैं गो इश्क़ की इस लज़्ज़त से हमें महरूम हुए इक उम्र हुई अब भी वो हमें महरूमी का एहसास दिलाने मिलते हैं दिन रात मिलाने पड़ते हैं घर छोड़ के जाना पड़ता है पुर ज़ोर मशक़्क़त से यारो कुछ रिज़्क़ के दाने मिलते हैं अब तक तो फ़िज़ा-ए-दिल पर भी वीरान ख़िज़ाँ का मौसम है देखें कि बहारों में अब के क्या ख़्वाब न जाने मिलते हैं देखो तो कभी , पलटो तो सही , अनमोल है इन का हर पन्ना माज़ी की किताबों में कितने नायाब फ़साने मिलते हैं हसरत के लहू का हर क़तरा मिट्टी में मिलाना पड़ता है मत पूछिए कितनी मुश्किल से ग़म के ये ख़ज़ाने मिलते हैं जज़्बात के पाओं में बेड़ी , गुफ़्तार पे क़ुफ़्ल-ए-नाज़-ए-अना वो मिलते भी हैं तो यूँ जैसे एहसान जताने मिलते हैं दो चार निवाले भी न मिले तो आब-ए-क़नाअत पी डाला इस बज़्म-ए-जहाँ की भीड़ में कुछ ऐसे भी घराने मिलते हैं तक़सीम-ए-मोहब्बत करते हैं मख़मूर-ए-ग़म-ए-दौराँ हो कर बेकैफ़ जहाँ में अब भी कुछ “ मुमताज़ ” दीवाने मिलते हैं

कभी मुझ को बनाते हो, कभी मुझ को मिटाते हो

एक हसीन इंग्लिश पोयम का मंज़ूम तर्जुमा तरह- you won’t say yes, you won’t say no कभी मुझ को बनाते हो , कभी मुझ को मिटाते हो ये कैसी कश्मकश है , क्यूँ मुझे तुम आज़माते हो शिकस्ता दिल तड़पता है तो तुम क्या मुस्कराते हो ज़रा सी मुस्कराहट से कई फ़ित्ने जगाते हो अज़ाबों के मुसलसल खेल में क्या लुत्फ़ पाते हो हमेशा दिल की बातें जान-ए-जाँ हम से छुपाते हो मचलता है , तड़पता है , तड़प कर मुस्कराता है मेरे दिल को अजब ख़दशात में तुम छोड़ जाते हो कभी जानाँ मेरी तक़दीर का भी फ़ैसला कर दो मुझे बेचैनियों के दायरों में क्यूँ घुमाते हो कभी ख़ुशफ़हमियों के आस्माँ पर रख दिया मुझ को बलन्दी से ज़मीं पर फिर कभी पल में गिराते हो हुए हैं तानाज़न अहबाब भी अब मेरी हालत पर इजाज़त हो तो कह दूँ , क्या सितम तुम मुझ पे ढाते हो अजब तर्ज़-ए-मसीहाई , ग़ज़ब तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है तज़बज़ुब के ये कैसे ख़्वाब तुम मुझ को दिखाते हो जिधर जाऊँ , जिधर देखूँ , सराबों का तसलसुल है मुझे “ मुमताज़ ” दश्त-ए-आरज़ू में क्या फिराते हो O riginal creation you won't say yes you won't s

इंसाफ़

ये नज़्म मैं ने तब लिखी थी जब इशरत जहां को सूप्रीम कोर्ट ने बेक़ुसूर करार दिया था...उम्मीद है आप को पसंद आएगी तोड़ ही डाला ख़ुदा ने लो तअस्सुब का ग़ुरूर दोस्तो , इशरत जहाँ साबित हुई है बेक़ुसूर देखना है ये सितारे रंग क्या दिखलाएंगे क्या बहाना अब के अपने रहनुमा फ़रमाएंगे किस तरह अब के हमारे ज़ख़्म ये सहलाएंगे क्या कहा ? इंसाफ़ ये मक़्तूल को दिलवाएँगे ? वाह वा , क्या ख़ूब हैं इन की करम फ़रमाइयाँ क्या अदा-ए-नाज़ है , क्या ख़ूब अंदाज़-ए-बयाँ वक़्त को माज़ी में लेकिन ले के जा सकते हैं क्या जान ये इशरत जहाँ की फिर दिला सकते हैं क्या खोई है इक माँ ने बेटी , वो भी लौटाएँगे क्या ? ज़ुल्म के ये देवता इंसाफ़ फ़रमाएँगे क्या ज़ुल्म के काले हुनर की बानगी तो देखिये रक्षकों की अपने ये मर्दानगी तो देखिये क्या करेंगे ये भला दहशत के दानव का शिकार एक अबला , बेबस-ओ-लाचार पर करते हैं वार आज इंसानी लहू से किस का दामन साफ़ है ? मार दो बेमौत जिस को चाहो , क्या इंसाफ़ है रहनुमाओ , जाँ हमारी इतनी सस्ती ? किस लिए ? घर जलाने वालों की ये सर परस्ती किस लिए ? दार पर इंसानियत

शिकस्ता हसरतों को अपना जो रहबर बना लेते

शिकस्ता हसरतों को अपना जो रहबर बना लेते हम अपनी ज़ात के अंदर भी इक महशर बना लेते हमारे दिल की आतिश सर्द होती जाती है वरना हम अपनी बेड़ियों को ढाल कर ख़ंजर बना लेते \ हम अपने हौसलों को अब भी जो थोड़ी हवा देते पसीने को भी अपने अंजुम-ओ-अख़्तर बना लेते अगर परवाज़ अपनी साथ दे देती इरादों का जुनूँ की ज़र्ब से हम आस्माँ में दर बना लेते मज़ा होता अगर इस सहबा-ए-उल्फ़त में थोड़ा भी तो दिल की किरचियों को जोड़ कर साग़र बना लेते अगर ये दौलत-ए-यास-ओ-अलम मिलती नहीं तो भी नज़र के शबनमी क़तरों को हम गौहर बना लेते अभी “ मुमताज़ ” इतना तो न था जज़्बा परस्तिश का तुझे क़िस्मत का अपनी किस लिए रहबर बना लेते